इयत्ता-प्रकृति

Sunday, March 21, 2010

22 मार्च को अन्तर्रष्ट्रीय जल दिवस


बस एक नारा है - पानी बचाओ
- राकेश 'सोहम' -
22 मार्च ! अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस !! इस अवसर पर मुझे अपनी कविता की कुछ पंग्तियाँ याद आतीं हैं -

भीषण पर्यावरण प्रदूषण दीख रहा प्रत्यक्ष
चेतें , जागें , लें संकल्प , घर-घर लगाएं वृक्ष

इन पंग्तियों में दो शब्द अति-महत्वपूर्ण हैं - 'चेतें' और 'जागें' । इन शब्दों का गूढ़ अर्थ कुछ यों होता है । 'चेतें' यानी जानकारी , 'जागें' मतलब पूरी जानकारी ।

मैं एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में मुलाजिम हूँ । यहाँ पर अधिकारी , कर्मचारी , औद्योगिक कामगार और मजदूर वर्ग के लोग कार्य करते हैं । इनमें अंगूठा छाप से लेकर उच्च - शिक्षित वर्ग के लोग शामिल हैं । जिनकी आयु 20 से 55 वर्ष से ऊपर की है । कुल मिलाकर ये पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं । ऐसा माना जा सकता है ।

पिछले दिनों 'नेशनल - सेफ्टी - कौंसिल' के दिशा निर्देश पर औद्योगिक संरक्षा पर साप्ताहिक आयोजन किया गया । इस आयोजन में एक 'संरक्षा - क्विज़' भी रखा गया । जिसमें सभी वर्ग के लगभग 500 लोगों ने भाग लिया ।

संरक्षा और सुरक्षा को वृहद् रूप देने की मंशा से मैंने बतौर क्विज़ मास्टर मुख्य रूप से दो प्रश्न रखे । पहला - क्या पालीथीन की थैलियाँ पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक हैं ? इस प्रश्न के ज़वाब में लगभग 90-95 प्रतिशत का ज़वाब 'हाँ' में था । वे मानते हैं कि पालीथीन की थैलियाँ उपयोग में नहीं लायीं जाना चाहिए ।

आश्चर्यजनक रूप से शेष लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उलटे प्रश् कर डाला - 'इसमें क्या बुराई है ? हम तो रोज़ पन्नियों का उपयोग करते हैं !'

इस प्रश्न के ज़वाब से ये माना जा सकता है कि अधिकतर लोगों को मात्र जानकारी है । पालीथीन या पन्नियों का प्रयोग करना चाहिए । यह वाक्य एक नारे के रूप में प्रचारित हुआ है, बस ! !

इस क्विज़ का दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न लोगों को कठिन बन पडा । इसमें पढ़े-लिखे आज के युवा भी भटक गए । मैंने प्लाटिक [नान-टेरेबिल] और कागज़ के दो विजिटिंग कार्ड दिखाकर प्रश्न पूछा - इन दो विजिटिंग कार्डस में से कौन सा कार्ड पर्यावरण कि दृष्टि से ठीक है ? अधिकतर लगभग 98-99 प्रतिशत लोगों ने प्लास्टिक के कार्ड को चुना !!

उक्त दो प्रश्नों के ज़वाब से एक बात उभरकर सामने आती है कि आम -जनता 'पन्नियों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए' को एक नारे के रूप में जानती है । उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि प्लास्टिक से बनी अन्य वस्तुएं भी पर्यावरण के लिए नुक्सान पहुंचा रहीं हैं ।

कुल मिलाकर आम-जनता को जानकारी तो है । पूरी जानकारी नहीं !

यही बात जल को लेकर भी कही जा सकती है । 'जल ही जीवन है !' इसे जनता नारे के रूप में जानती और समझती है । लेकिन जल संरक्षण क्यों, इसका अभाव है ?

तभी जबलपुर शहर जिसे ताल-तलैयों और जलाशयों का शहर माना जाता है, आज जलाभाव से गुज़र रहा है ! यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने वाला जल गायब है । भू-जलस्तर नीचे चला गया है । कामोबेश यही स्थिति पूरे देश के शहरों की है । यहाँ की स्थानीय प्रशासनिक लचर नीतियों के चलते पानी से लबरेज़ अधिकतर ताल - तलैयों को पूरकर कालोनियां विकसित की जा रहीं हैं । जलाशयों को बचाकर विकसित करने की कोई योजना फिलहाल दूर-दूर तक नज़र नहीं आती ?

क्या आम जनता और प्रशासन केवल नारे उच्चारती रहेगी ? आम नागरिक कब जागेगा ?? क्या कोई योजना सामने आएगी ???

अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस पर मैं तो यही महामंत्र जपूंगा - ' वायु जल सर्वत्र हो शुभ गंध को धारण किये ' सर्वांत जल ही जीवन है ..ये मानो ..जल को जल के जैसे !

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