इयत्ता-प्रकृति

Tuesday, June 1, 2010

प्रकृति के प्रति पीढ़ीगत स्मृति लोप ?

5 जून
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विश्व पर्यावरण दिवस
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= राकेश 'सोहम' =

हम कई दिनों से एल ० टी० सी० लेकर बाहर कहीं घूम आने की योजना बना रहे हैं । कोई ऐसी जगह जहां कुदरत का भरपूर नज़ारा हो । लेकी हर बार यह विचार मज़बूत नहीं हो पाता । प्रकृति से रूबरू हो पाने की योजना असफल हो जाती है !

बच्चों और श्रीमती जी क कहना है - ऐसी जगह क्या घूमना । किसी महानगर को घूमने चला जाए । प्रकृति, हरियाली, पंछी और जानवर आदि तो हम टी.वी० पर देख लेते हैं ।

इस तरह की सोच ना केवल मेरे परिवार में बल्कि लगभग हर युवा में जनम चुकी है ! वे आभासी कुदरत को ही असली कुदरत मान रहे हैं । दिन प्रतिदिन असली प्रकृति का महत्त्व घटता नज़र आ रहा है !! आम तौर पर शहरी माहौल में रहने वाले बच्चे प्रकृति से कटते जा रहे हैं । वे ना पंछियों का कलरव सुन पाते हैं ना ही कुत्ते बिल्ली के अलावा कोई और पशु या जानवर देख पाते हैं ।
एक वैज्ञानिक शोध बताता है की प्रकृति से दूरी की वजह से शहरों में तनाव बढ़ रहा है । जो सुकून वास्तविक प्रकृति से मिलता है वह आभासी प्रकृति से नहीं मिलता । चाहे वह प्रकृति हम प्लाज्मा टी.वी। में ही क्यों ना देखें ।

आज का कड़वा सच यह है कि वास्तविक कुदरत का अहसास समाप्त हो रहा है । इसे वैज्ञानिक भाषा में एन्वाय्रंमेंटल जन्रेश्नल अम्नीश [ प्रकृति के प्रति पीढ़ीगत स्मृति लोप ] कहा जाता है ।

कहीं हम इसके शिकार तो नहीं हो रहे हैं ? खैर ! मैंने तो प्रकृति से जुड़ने के लिए आरक्षण करा लिया है ।

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