इयत्ता-प्रकृति

Wednesday, February 17, 2010

श्श्श्श.. s..s..MY NAME IS कान !! [बनाम ध्वनी प्रदुषण]

कान, नाक एवं गला विशेषज्ञों की दो दिवसीय कार्यशाला विगत सप्ताह जबलपुर शहर के गवर्नमेंट नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कालेज में संपन्न हुई । प्रतिष्ठित व ख्यातिलब्ध ई एन टी विशेषज्ञों ने बधिरों की जटिल शल्य चिकित्सा की । इस आयोजन में यह बात साफ़ तौर से चर्चा में रही कि जन्मजात बधिरों को छोड़कर 80 से 90 प्रतिशत मामलों में आंशिक या पूरी तौर से बहरेपन का मूल कारण ध्वनि-प्रदूषण है । हालांकि डॉक्टर इस बात कि ख़ुशी व्यक्त कर रहे हैं कि बहरेपन की समस्या से निजात पाना अब सम्भव हो गया है । काक्लियर इम्प्लांट अभी काफी मंहगी तकनीक है । आनेवाले समय मैं यह आम आदमी की पंहुच में आ जायेगी और उनका बहरापन मात्र 4 से 6 लाख में दूर किया जा सकेगा !!

अभी कल की बात है । मैं अपनी पत्नी जी को लेकर स्कूटर से बाज़ार जा रहा था । भीड़ भरी सड़क पर पीछे से आने वाला मोटर-साइकल सवार लगातार हार्न दे रहा था । मुद्दा ये नहीं है कि वह हार्न क्यों दे रहा था ! बल्कि सवाल ये है कि राह पर वाहन चलाते हुए हमने कितनी बार अनावश्यक हार्न बजाया ? क्या हम केवल शौक़ के लिए हार्न बजाते हैं ? क्या हम अनावश्यक ध्यानाकर्षण के लिए हार्न बजाते हैं ? अपने आप का आकलन करें .

आज जबलपुर शहर में लगभग साढ़े चार लाख वाहन हैं । इनकी संख्या दिन-ब-दिन बढती जा रही है । शहरी विकास की गति इतनी धीमी है कि सड़कें यथावत संकरी की संकरी हैं ? दूसरी ओर बैंकों और ऋण मुहैया कराने वाले संस्थानों ने हर तबके के लोगों को वाहन थमा दिया है । सड़कों पर वाहनों का दवाब बढ़ रहा है । असामाजिक तत्व और आज के युवा खाली सड़क पर लगातार हार्न की बटन पर अंगूठा रखे फर्राटा मारते रहते हैं । उन्होंने दो-पहिया वाहनों में न न प्रकार के हार्न लगा रखे हैं । ये हार्न का बटन दबाने पर तो बजते ही हैं, ब्रेक पर पैर रखने से भी विचित्र ध्वनी के साथ बज उठते हैं !

ऐसे कान-फाडू शोर से पत्नी जी के सिर में दर्द होने लगता है । उन्होंने अपने कान को हथेली से ढँक लिया और मेरे कान के पास मुंह लाकर कहा, ' स्कूटर रोककर पीछे वाले वाहन चालक को रास्ता दे दो । कामोवेश हर सभ्य नागरिक की यही स्थिति है । वह हमारे चारों ओर फैले शोर को रास्ता दे रहा है । शादी-व्याह, तीज-त्यौहार, पूजा-अर्चन या फिर कोई आयोजन के नाम पर ध्वनी विस्तारक यंत्र भोंपू के सामान प्रदूषण फैलाते रहते हैं । हम अपनी सभ्यता की आड़ में दरवाज़ा बंद कर लेते हैं ?

मैं यहाँ वे आंकड़े नहीं दूंगा कि कितने डेसिबल की ध्वनि कानों के लिए घातक है या कितनी काम ध्वानि केवल कुत्ता ही सुन सकता है, हम नहीं ! मैं यहाँ आज की आधुनिक सभ्यता से प्रश्न करना चाहता हूँ - क्या हम सुधरेंगे ? क्या प्रशासन कोई ऐसा ठोस कानून लाएगा जिससे ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लग सके ?? आम सभ्य जन और प्रशासन कब तक बधिरों की नाई निष्क्रिय बने रहेंगे ???

हमें स्वयं अनावश्यक ध्वनि विस्तारक यंत्रों के प्रयोग कम करने होंगे । हम सुधरेंगे तो युग सुधरेगा ।

हम देर रात कालोनी लौटे । घर के सामने स्कूटर बंद करने के पहले आदतन स्कूटर का हार्न बजाने जा रहा था ताकि घर के अन्दर बच्चे जाग जाएँ । लेकिन पत्नी जी ने मना कर दिया और घर की इलेक्ट्रोनिक डोर बेल का बटन दबा दिया । ...ॐ शान्तिः ..शान्तिः ..शान्तिः ...का कर्णप्रिय मंद स्वर घर के अन्दर से तैरता हुआ मेरे कानों तक पहुंचा और कानों ने जैसे हौले से कहा - ' श्श्श ...माय नेम इज कान !! MY NAME IS KAAN'

[] राकेश 'सोहम'

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4 Comments:

  • यहां तो हनुमान मन्दिर में सवेरे से चिंचियाने लगता है लाउड स्पीकर! :-(

    By Blogger ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey, At February 17, 2010 at 5:28 PM  

  • कब तक झेलेंगे इस शहर को

    By Blogger ravishndtv, At February 17, 2010 at 7:31 PM  

  • इतने ध्वनि प्रदूषण और महंगाई के बावजूद न तो हमने ऊंची आवाज़ में स्पीकर बजाना छोड़ा है और शादी-ब्याह में बैंड बाजे का इस्तेमाल. सिर्फ़ अपना ही नहीं, आसपास के लोगों का भी जीना मुहाल कर देते हैं. इससे भी ज़्यादा हैरत तब होती है जब हम बारातों के चलते सड़क जाम देखते हैं.

    By Blogger इष्ट देव सांकृत्यायन, At February 17, 2010 at 7:43 PM  

  • ध्वनि प्रदुषण पर बहुत अच्छा लेख लिखा है, डैडी - भोपाल

    By Blogger Smarika, At February 20, 2010 at 7:20 PM  

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