Tuesday, June 18, 2013

PARYAAWARAN

पर्यावरण - मुसीबत के बोल ?

पिछले दिनों रिज़र्वेशन नहीं मिला. अतः वीडियो कोच बस से लम्बी यात्रा करनी पड़ी . इंदौर से मुंबई की यात्रा के दौरान एक फिल्म देखने का मौक़ा मिला- 'बोल'. इस फिल्म के एक दृश्य ने मुझे विचलित करके रख दिया . फिल्म का एक पात्र दूसरे पात्र का सोते समय मर्डर कर देता है .

वह उस पात्र के सर को पालीथीन की थैली में घुसाकर, उसके दोनों हाथों को जकड़ लेता है और पालीथीन के अन्दर उसका दम घुट जाता है . उखड़ती साँसों के साथ फूलती-पिचकती पालीथीन का दृश्य दिल-दहलाने वाला था .

खैर ! बात फिल्म के दृश्य से जोड़ते हुए एक ताज़ा रिपोर्ट की चर्चा मैं इधर करना चाहता हूँ . इसके अनुसार मुंबई शहर से सटे ठाणे शहर में प्लास्टिक थैलियों की खपत प्रतिदिन बढ़ने की बात सामने आई है . इस शहर में प्रतिदिन प्लास्टिक की 12 मैट्रिक टन वज़न की 42 लाख थैलियों की खपत हो रही है ! शहर में प्रतिदिन 850 मैट्रिक टन कचरा निकलता है , जिसमे 75 से 80 फ़ीसदी कचरा प्लास्टिक थैलियों और प्लास्टिक से सम्बंधित चीज़ों का होता है .

प्लास्टिक चीजों में दूध की थैलियाँ, सौन्दर्य प्रसाधनों को रखने की प्लास्टिक सामग्री, तेल जैसे तरल पदार्थों को रखने की थैलियाँ और पानी की प्लास्टिक की बोतलें एवं ग्लास आदि . कुलमिलाकर प्लास्टिक ही प्लास्टिक का कचरा .

जब ठाणे शहर के हाल है तो मुंबई महानगर की पूछो ही मत . मैं इन दिनों मुंबई में पदस्थ हूँ . मैं यह देख रहा हूँ की आर्थिक महानगरी प्लास्टिक की थैलियों के ढेर पर खड़ी है . सामानों की खरीद-फरोख्त में इन थैलियों का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है . न चाहते हुए भी सब्जियों को पालीथीन की थैलियों में रखकर दिया जाता है . और लोग बड़ी शान से दोनों हाथों की पाँचों उँगलियों में इन्हें लटकाए निकल पड़ते हैं .

आज यहाँ के समुद्री किनारे पालीथीन और डिस्पोजेबल वाटर बाटलों से आटे पड़े है . चाहे वह गेटवे ऑफ़ इंडिया हो या कोई और बीच .

कल नवीं मुंबई से मुंबई जा रहा था . एक लम्बे खाड़ी लिंक से दूसरी ओर पहुंचा . एक लंबा चौड़ा नाला पालीथीन की थैलियों से अटा पडा था . उसका गंदा पानी ओवर फ्लो हो रहा था . सड़ांध से परेशान रूमाल नाक पर रख लिया . सड़ांध तब भी नहीं गई . दम घुटने लगा था . अनायास ही साँसों के साथ फूलती - पिचकती पालीथीन का वह भयावह दृश्य ताज़ा हो गया और शुद्ध हवा की तलाश में रूमाल बस की खिड़की से बाहर उड़ गया .

[] राकेश सोहम , मुंबई से    
 

Sunday, March 3, 2013

प्रदूषित कविताएँ

अब मैं
प्रदूषण पर
कविताएँ नहीं करता .

क्योंकि जल, वायु या
पर्यावरण पर
प्रदूषण  की कविताएँ
पत्रिकाओं में
नहीं छपतीं
सामान्य कविताओं की तरह.

ये कविताएँ
मुझे
अवसाद से
प्रदूषित कर जातीं हैं
बुरी तरह !

प्रदूषण की कविताएँ
मौसमी होतीं है।

जबकि प्रदूषण,
बारहों महीने ..
प्रतिदिन
हर क्षण .... !

अब मैं
प्रदूषण पर
कविताएँ नहीं करता ?

[] राकेश सोहम , नवीं मुंबई 

Friday, March 16, 2012

रूमाल ?




विडम्बना है

कल जब

हांफता हुआ

और रोता बिलखता

पर्यावरण

मेरे पास आयेगा,

तब मैं

उसके आंसू भी

नहीं पोंछ सकूंगा

क्योंकि

मेरे हाथ में

पालीथीन है !


[] राकेश सोहम 9425800933








Saturday, June 25, 2011

अब मै सुरक्षित हूँ ?



इस सदी ने

मेरे दिल को

चीरकर

रख लिया है

सहेजकर

पॉलीथीन में;

कभी न सड़ने के लिए !!

[] राकेश 'सोहम'

Saturday, January 29, 2011

आक्रामक पन्नियाँ




हर दूसरे दिन
घर के
किसी कोने में
इकट्ठी हो जातीं हैं
दर्ज़नों पॉलीथीन

ये पन्नियाँ
हमारी मानसिकता को
सूंघ लेतीं हैं
और आ जातीं हैं
हमारे पीछे पीछे ...

सब्जियों के साथ
किराने के साथ
कपड़ों के साथ
उपहार में
या फिर
मंदिर के प्रसाद में !

ये कभी
नष्ट नहीं होतीं
और
बना देती हैं
हमारी मानसिक
उर्वरा शक्ति को
क्षीण ! अति क्षीण !!

हाँ, तभी तो
उसमें उपजती नहीं
संकल्प-शक्ति,
पनपता नहीं -
दृढ विश्वाश
मधुर संबंधों के लिये ?
अब
आक्रामक हो गयीं हैं
पन्नियाँ !!!

[] राकेश 'सोहम'
{पत्र-पत्रिका में प्रकाशन पर अंक की एक प्रति एल - १६, देवयानी काम्प्लेक्स, जय नगर, गढ़ा रोड जबलपुर - 482002 पर प्रेषित करें }

Tuesday, June 1, 2010

प्रकृति के प्रति पीढ़ीगत स्मृति लोप ?

5 जून
--------------------
विश्व पर्यावरण दिवस
०००००००००००००००
= राकेश 'सोहम' =

हम कई दिनों से एल ० टी० सी० लेकर बाहर कहीं घूम आने की योजना बना रहे हैं । कोई ऐसी जगह जहां कुदरत का भरपूर नज़ारा हो । लेकी हर बार यह विचार मज़बूत नहीं हो पाता । प्रकृति से रूबरू हो पाने की योजना असफल हो जाती है !

बच्चों और श्रीमती जी क कहना है - ऐसी जगह क्या घूमना । किसी महानगर को घूमने चला जाए । प्रकृति, हरियाली, पंछी और जानवर आदि तो हम टी.वी० पर देख लेते हैं ।

इस तरह की सोच ना केवल मेरे परिवार में बल्कि लगभग हर युवा में जनम चुकी है ! वे आभासी कुदरत को ही असली कुदरत मान रहे हैं । दिन प्रतिदिन असली प्रकृति का महत्त्व घटता नज़र आ रहा है !! आम तौर पर शहरी माहौल में रहने वाले बच्चे प्रकृति से कटते जा रहे हैं । वे ना पंछियों का कलरव सुन पाते हैं ना ही कुत्ते बिल्ली के अलावा कोई और पशु या जानवर देख पाते हैं ।
एक वैज्ञानिक शोध बताता है की प्रकृति से दूरी की वजह से शहरों में तनाव बढ़ रहा है । जो सुकून वास्तविक प्रकृति से मिलता है वह आभासी प्रकृति से नहीं मिलता । चाहे वह प्रकृति हम प्लाज्मा टी.वी। में ही क्यों ना देखें ।

आज का कड़वा सच यह है कि वास्तविक कुदरत का अहसास समाप्त हो रहा है । इसे वैज्ञानिक भाषा में एन्वाय्रंमेंटल जन्रेश्नल अम्नीश [ प्रकृति के प्रति पीढ़ीगत स्मृति लोप ] कहा जाता है ।

कहीं हम इसके शिकार तो नहीं हो रहे हैं ? खैर ! मैंने तो प्रकृति से जुड़ने के लिए आरक्षण करा लिया है ।

Sunday, March 21, 2010

22 मार्च को अन्तर्रष्ट्रीय जल दिवस


बस एक नारा है - पानी बचाओ
- राकेश 'सोहम' -
22 मार्च ! अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस !! इस अवसर पर मुझे अपनी कविता की कुछ पंग्तियाँ याद आतीं हैं -

भीषण पर्यावरण प्रदूषण दीख रहा प्रत्यक्ष
चेतें , जागें , लें संकल्प , घर-घर लगाएं वृक्ष

इन पंग्तियों में दो शब्द अति-महत्वपूर्ण हैं - 'चेतें' और 'जागें' । इन शब्दों का गूढ़ अर्थ कुछ यों होता है । 'चेतें' यानी जानकारी , 'जागें' मतलब पूरी जानकारी ।

मैं एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में मुलाजिम हूँ । यहाँ पर अधिकारी , कर्मचारी , औद्योगिक कामगार और मजदूर वर्ग के लोग कार्य करते हैं । इनमें अंगूठा छाप से लेकर उच्च - शिक्षित वर्ग के लोग शामिल हैं । जिनकी आयु 20 से 55 वर्ष से ऊपर की है । कुल मिलाकर ये पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं । ऐसा माना जा सकता है ।

पिछले दिनों 'नेशनल - सेफ्टी - कौंसिल' के दिशा निर्देश पर औद्योगिक संरक्षा पर साप्ताहिक आयोजन किया गया । इस आयोजन में एक 'संरक्षा - क्विज़' भी रखा गया । जिसमें सभी वर्ग के लगभग 500 लोगों ने भाग लिया ।

संरक्षा और सुरक्षा को वृहद् रूप देने की मंशा से मैंने बतौर क्विज़ मास्टर मुख्य रूप से दो प्रश्न रखे । पहला - क्या पालीथीन की थैलियाँ पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक हैं ? इस प्रश्न के ज़वाब में लगभग 90-95 प्रतिशत का ज़वाब 'हाँ' में था । वे मानते हैं कि पालीथीन की थैलियाँ उपयोग में नहीं लायीं जाना चाहिए ।

आश्चर्यजनक रूप से शेष लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उलटे प्रश् कर डाला - 'इसमें क्या बुराई है ? हम तो रोज़ पन्नियों का उपयोग करते हैं !'

इस प्रश्न के ज़वाब से ये माना जा सकता है कि अधिकतर लोगों को मात्र जानकारी है । पालीथीन या पन्नियों का प्रयोग करना चाहिए । यह वाक्य एक नारे के रूप में प्रचारित हुआ है, बस ! !

इस क्विज़ का दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न लोगों को कठिन बन पडा । इसमें पढ़े-लिखे आज के युवा भी भटक गए । मैंने प्लाटिक [नान-टेरेबिल] और कागज़ के दो विजिटिंग कार्ड दिखाकर प्रश्न पूछा - इन दो विजिटिंग कार्डस में से कौन सा कार्ड पर्यावरण कि दृष्टि से ठीक है ? अधिकतर लगभग 98-99 प्रतिशत लोगों ने प्लास्टिक के कार्ड को चुना !!

उक्त दो प्रश्नों के ज़वाब से एक बात उभरकर सामने आती है कि आम -जनता 'पन्नियों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए' को एक नारे के रूप में जानती है । उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि प्लास्टिक से बनी अन्य वस्तुएं भी पर्यावरण के लिए नुक्सान पहुंचा रहीं हैं ।

कुल मिलाकर आम-जनता को जानकारी तो है । पूरी जानकारी नहीं !

यही बात जल को लेकर भी कही जा सकती है । 'जल ही जीवन है !' इसे जनता नारे के रूप में जानती और समझती है । लेकिन जल संरक्षण क्यों, इसका अभाव है ?

तभी जबलपुर शहर जिसे ताल-तलैयों और जलाशयों का शहर माना जाता है, आज जलाभाव से गुज़र रहा है ! यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने वाला जल गायब है । भू-जलस्तर नीचे चला गया है । कामोबेश यही स्थिति पूरे देश के शहरों की है । यहाँ की स्थानीय प्रशासनिक लचर नीतियों के चलते पानी से लबरेज़ अधिकतर ताल - तलैयों को पूरकर कालोनियां विकसित की जा रहीं हैं । जलाशयों को बचाकर विकसित करने की कोई योजना फिलहाल दूर-दूर तक नज़र नहीं आती ?

क्या आम जनता और प्रशासन केवल नारे उच्चारती रहेगी ? आम नागरिक कब जागेगा ?? क्या कोई योजना सामने आएगी ???

अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस पर मैं तो यही महामंत्र जपूंगा - ' वायु जल सर्वत्र हो शुभ गंध को धारण किये ' सर्वांत जल ही जीवन है ..ये मानो ..जल को जल के जैसे !