इयत्ता-प्रकृति

Saturday, January 29, 2011

आक्रामक पन्नियाँ




हर दूसरे दिन
घर के
किसी कोने में
इकट्ठी हो जातीं हैं
दर्ज़नों पॉलीथीन

ये पन्नियाँ
हमारी मानसिकता को
सूंघ लेतीं हैं
और आ जातीं हैं
हमारे पीछे पीछे ...

सब्जियों के साथ
किराने के साथ
कपड़ों के साथ
उपहार में
या फिर
मंदिर के प्रसाद में !

ये कभी
नष्ट नहीं होतीं
और
बना देती हैं
हमारी मानसिक
उर्वरा शक्ति को
क्षीण ! अति क्षीण !!

हाँ, तभी तो
उसमें उपजती नहीं
संकल्प-शक्ति,
पनपता नहीं -
दृढ विश्वाश
मधुर संबंधों के लिये ?
अब
आक्रामक हो गयीं हैं
पन्नियाँ !!!

[] राकेश 'सोहम'
{पत्र-पत्रिका में प्रकाशन पर अंक की एक प्रति एल - १६, देवयानी काम्प्लेक्स, जय नगर, गढ़ा रोड जबलपुर - 482002 पर प्रेषित करें }

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