इयत्ता-प्रकृति

Sunday, September 27, 2009

हिमालय को चरने में लगी गाजर

इष्ट देव सांकृत्यायन 

विदेशों से आई ज़हरीली वनस्पतियों के चलते नदियां और मैदानी ज़मीन तो पहले से ही दुष्प्रभावित होती रही है, अब ख़बर है कि पहाड़ भी इससे अछूते नहीं रहे. नवीनतम ख़बर के मुताबिक गिरिराज हिमालय एक घास की चपेट में आ रहे हैं. यह घास है गाजर घास. कल ही दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक उत्तराखंड की कुल ख़ाली ज़मीन के 90 फ़ीसदी हिस्से में यह ज़हरीली घास फैल चुकी है. यह घास भूमि को तो बंजर बनाती ही है, आसपास की वनस्पतियों और वातावरण को भी ज़हरीला बना देती है. सबसे त्रासद बात यह है कि इसके दुष्प्रभावों से सुपरिचित वैज्ञानिक इसे मिटाने के लिए दवा ईजाद होने के इंतज़ार में हैं. ग़नीमत है कि वे हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक हैं, जो कर्म पर कम और भाग्य पर ज़्यादा भरोसा करते हैं. इसीलिए इसे समूल मिटाने की हैसियत रखने वाली कोई दवा अभी तक ईजाद भी नहीं हो सकी है और वह तब तक ईजाद भी नहीं होगी जब तक किसी यूरोपीय देश या अमेरिका में इसका दुष्प्रभाव नहीं फैलता और वहां के लोग इस मामले में जागरूक नहीं होते. लेकिन यह सोचने की बात है कि अगर ऐसी कोई दवा ईजाद हो ही गई तो क्या उसका प्रयोग सुरक्षित होगा? उसके प्रयोग से गाजर घास भले नष्ट हो जाए, पर इस बात का क्या भरोसा कि उससे कुछ दूसरे नुकसान नहीं होंगे?


आइए नज़र डालते हैं इसके इतिहास-भूगोल पर. देहरादून से दिनेश कुकरेती की रिपोर्ट के मुताबिक यह घास मेक्सिको से भारत आई 70 के दशक में वहां से आयातित गेहूं के साथ. यही गाजर घास यानी पार्थेनियम अब उत्तराखंड के लिए काल बन गई है. 1962 में चीन से युद्ध के बाद भारत ने मेक्सिको से पीएल-57 गेहूं आयात किया और इसी के साथ गाजर घास देश में घुस आई. पंजाब से होते हुए यह ज़हरीली घास दो दशकों के भीतर लगभग पूरे देश में फैल गई, क्योंकि एक बार जड़ जमाने के बाद यह सुरसा के मुंह की तरह फैलती है, लाख जतन करने पर भी ख़त्म नहीं होती. उत्तराखंड में अपने शुरुआती दौर में इस घास ने समुद्रतल से आठ सौ फुट की ऊंचाई पर पैर पसारे और आज यह 4500 फुट की ऊंचाई पर भी जमीन की उर्वरता और वनस्पतियों को चाट रही है. हर वातावरण में ख़ुद को ढाल लेने की ख़ूबी के चलते अब यह हिमालय की ओर बढ़ रही है. समुद्रतल से 4500 फुट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी यह घास राज्य की ज़मीन को बंजर करने के साथ ही वनस्पतियों व वातावरण को ज़हरीला बनाने में लगी है. इसके संपर्क में आने से इंसान, पशु-पक्षी और वनस्पतियों को तमाम बीमारियां लग रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि पार्थेनियम जहां भी पनपता है, वहां ज़मीन की नमी को पूरी तरह सोखकर उसे ऊसर बना देता है. इसके संपर्क में रहने से इंसान, पशु-पक्षी और वनस्पतियां सभी तमाम बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. इससे निकलने वाला विशेष प्रकार का केमिकल अन्य वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को अवरुद्ध कर देता है. इसके प्रभाव में आने से चेहरे, गर्दन समेत शरीर के खुले हिस्सों में खुजली होने लगती है, जो धीरे-धीरे एग्जिमा में परिवर्तित हो जाती है. इसके संपर्क में आने से एलर्जी, अस्थमा अटैक, एयर बोर्न कांटेक्ट डिज़ीज़ भी हो सकती हैं.

इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह ख़ुद को हर तरह के माहौल के अनुरूप ढाल लेती है और इसके ही चलते इसका जीवनचक्र छह से बढ़कर अब साढ़े नौ तक महीने पहुंच चुका है. आज तक ऐसी कोई दवा ईजाद नहीं हुई है, जो इसे समूल मिटा दे. हालांकि 1985 में गाजर घास के उन्मूलन के लिए जाइगोग्रामा बाइक्लोरेटा नामक कीट को मेक्सिको से लाकर पार्थेनियम प्रभावित क्षेत्रों में छोड़ा गया, लेकिन यह कीट यहां के वातावरण के अनुकूल स्वयं को नहीं ढाल पा रहा है. फ़िलहाल इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (पूसा इंस्टीट्यूट) भी इस मसले पर कार्य कर रहा है. 
अब सवाल यह है कि क्या हम ऐसे ही बैठे-बैठे ताकते रहें? क्या देश सिर्फ़ नेताओं और अधिकारियों का है और हमारा इस पर कोई हक़ नहीं है? अगर हक़ है और किसी ने किसी रूप में हम उसका दावा करते हैं तो फिर फ़र्ज़ का क्या होगा? आख़िर हम हक़ की ही तरह फ़र्ज़ पर भी आगे बढ़ कर दावा क्यों नहीं ठोंकते? कब तक हम इंतज़ार करते रहेंगे किसी तीसरे के घर में भगत सिंह के पैदा होने अपने दरवाज़े पर कूड़ा हटाने के लिए किसी तीसरे के आने का? इसके ख़तरे को समझें और ठीक से समझें. अगर यह ख़तरा समझ में आ गया है तो फिर या तो उसे झेलने के लिए तैयार हो जाएं या फिर मिटाने के लिए.
मेरी मानें आलस्य में पड़े रह कर आगे बड़ा कष्ट झेलने से बेहतर है कि हम इसे मिटाने के लिए ही कमर कस लें और वह कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है. इसके उपाय का सर्वोत्तम उपाय है इस सन्दर्भ में जागरूकता और सामूहिकता की भावना. बजाय दवा और कीट के भरोसे बैठने के, बेहतर यह होगा कि लोग इसे ख़ुद ही उखाड़-उखाड़ कर जला दें. इस मामले में यह न सोचें कि घास मेरे घर के सामने उगी है या किसी और के! जहां कहीं भी देखें वहीं इसे उखाड़ें और जला दें. इस मामले में सच्ची समूह भावना का परिचय दें. इसके लिए सभी तरह की दुर्भावनाएं छोड़ कर जागना हमें ही पड़ेगा.
सच तो यह है कि तरीक़ा यही सही होगा. क्योंकि इस बात का भी कोई भरोसा नहीं है कि अगर कोई दवा ईजाद हो जाए तो आगे पर्यावरण के लिए नुकसानदेह साबित न हो. क्या पता दवा गाजर घास को तो मार दे, पर इसकी जगह कोई नई बीमारी दे जाए! जबकि उखाड़ कर जला देने का तरीक़ा थोड़ा समय ज़्यादा ज़रूर लेगा, लेकिन है सौ प्रतिशत सुरक्षित. इससे घास भी ख़त्म हो जाएगी और कोई नई बीमारी भी नहीं आएगी. एक बात और, यह बिलकुल न सोचें कि यह घास सिर्फ़ हिमालय में ही उग रही है. मैदानी इलाकों में भी यह घास बहुतायत से दिख रही है. बिलकुल गाजर के पौधे जैसे दिखने वाले इसके पौधे आपके घर के आसपास या खेत-खलिहान में भी हो सकते हैं. आपके पडोस में भी हो सकते हैं. जहां ख़ुद मिटा सकें वहां तो ख़ुद मिटा दें और जहां ख़ुद न मिटा सकें, वहां जिससे संभव हो उसे समझा कर इसे मिटाने का प्रयास करें. ध्यान रखें, इसे मिटाने पर ही आपके पर्यावरण की जीवंतता और आपका अन्न निर्भर है. लिहाजा इस मामले में सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका को दोषी ठहराने के तरीक़े न ढूंढें. इससे आपको कोई लाभ नहीं होगा. नुकसार आपको ज़रूर भुगतना पड़ेगा. लिहाजा इसमें देर न करें, अभी जुट जाएं.  

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Saturday, September 26, 2009

राम तेरी गंगा मैली हो गई

विनय ओझा 'स्नेहिल'
राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म देखी होगी। यह फिल्म प्रधान मंत्री ने भी देखी। प्रधान मंत्री जी भले आदमी हैं। उन्होंने मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और यह चर्चा की कि गंगा हमारी माता के समान है, और मैली हो गई हैं लिहाज़ा उनकी सफाई हमारी जिम्मेदारी है और इस सन्दर्भ में क्या किया जा सकता है? गैर सरकारी संगठनों और परियोजना विशेषग्यों से विचार-विमर्श करने पर पता चला कि कई करोड़ रूपए खर्च होंगे फिर भी उसके स्वच्छ होने की कोई गारंटी नहीं है। अब देखिए न दिल्ली में यमुना की सफाई का भगीरथ प्रयास किया हमने, परिणाम यह हुआ कि यमुना जी ही साफ हो गयीं। तो एक ने कहा कि गंगा जी साफ नहीं हो सकती हैं। उन्होंने पूँछा- ऐसा क्यों? उत्तर आया-साहब फिल्म का तात्पर्य है कि लोग गन्दे हो गए हैं,राजनीति गन्दी हो गई है। समाज गन्दा हो गया है। सारा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार के कोढ़ से अपंग हो गया है। जब तक ये लोग अपना पाप धोने के लिए गंगा स्नान करने प्रति वर्ष जाते रहेंगे, गंगा मैली ही रहेगी। उन्होंने पुनः प्रश्न किया-फिर क्या किया जा सकता है? उत्तर आया-सरकार गंगा माता से पहले पूरे सरकारी तंत्र की सफाई करनी पड़ेगी। सबके भीतर से भ्रष्टाचार के वायरस को निकालना होगा जो कोढ़ बन कर फूट रहा है। प्रधान मंत्री जी जेब से सूआ निकाल कार सिर खुजाते हुए कहते हैं कि फिर क्या किया जा सकता है? किसी ने कहा कि सरकारी तंत्र की सफाई तो सम्भव नहीं है क्यों कि राजनेताओं में इस बात पर आम सहमति बननी सम्भव नहीं है। चलिए गंगा की ही सफाई करते हैं। प्रश्न आया करोड़ों रूपए का खर्च कहाँ से आएगा? किसी ने कहा स्विस बैंक से सारा पैसा निकाल कर गंगा माता की सफाई में लगा देते हैं। एक स्वर आया कि हाँ सरकार अच्छा विचार है। दो नंबर का पैसा एक नंबर के काम में लग जएगा। दिव्य नदी का पावन जल सवच्छ हो जाएगा और फिर संतों द्वारा टी।वी। चैनलों पर प्रचार करा दिया जाएगा कि कांग्रेस ने गंगा माता की सफाई कराई है, जो आज तक कोई दल नहीं कर पाया । इस प्रकार लोगों के मन में कांग्रेस के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ेगी और हम फिर चुनाव जीत कर सत्ता में आ जाएंगे और फिर हमारा सरकारी तंत्र जो पैसा कमाएगा स्विस बैंक में वापस जमा कर देंगे। किसी ने कहा हाँ सरकार ‘रीकरिंग डिपोजिट’ खोला जा सकता है । तभी पीछे से एक स्वर आया कि स्विस बैंक में क्या तुम्हारे बाप का पैसा है। सरदार जी ने फिर सिर खुजाते होए बोला फिर वापस चला आएगा ना । पीछे से एक स्वर आया-वह कैसे? वर्तमान चुनाव आयुक्त की कांग्रेस पर पूरी निष्ठा है। चुनाव आयुक्त की इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों पर पूरी निष्ठा है,क्यों कि सॉफ्ट- वेयर उन्ही के डलवाए हुए हैं । जनता वोट के लिए चाहे कोई बटन दबाए पर गिनती कांग्रेस के ही झोली में जाएगी,किंतु कुछ भी हो पैसा स्विस बैंक से नहीं निकलेगा। मीडिया को पता चल गया तो डंका बज जाएगा कि पैसा किस पार्टी का है। कई दसकों से चले आ रहे रहस्य का पटाक्षेप हो जाएगा कि स्विस बैंकों में खाते किसी उद्योग पति के हैं या किसी समर्पित जन-सेवी के ।तब तक एक वकील साहब का उर्वर मस्तिष्क काम कर गया। उन्होंने कहा कि हर्र लगे ना फिटकिरी रंग भी चोखा होय। गंगा का मैलापन राष्ट्रीय स्तर का है जिसे साफ नहीं किया जा सकता है। दोनों में एक समानता है इस राष्ट्र की राजनीति को जिस तरह साफ नहीं किया जा सकता है, उसी तरह गंगा का मैलापन भी साफ नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वही मन के मैले लोग गंगा में फिर डुबकी लगाएंगे और फिर गंगा मैली की मैली। ऐसे में यदि साफ सुथरा व्यक्ति भी गंगा स्नान करेगा तो वह भी मैला हो जाएगा।इस लिए गंगा का मैलापन एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है।उसमें स्नान करके स्वच्छ होने के बज़ाय पूरा देश गन्दा हो गया है। इस लिए इसे राष्ट्रीय नदी का दर्जा दे देना चाहिए। इससे अगले आम चुनाव में हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो जाएगा और यह चुनाव परिणाम भी हमारे पक्ष में हो जाएगा । तभी एक अधिसूचना जारी की गई कि गंगा एक राष्ट्रीय नदी हैं। परिणाम स्वरूप जो हाल राष्ट्रीय पशु चीता, राष्ट्रीय पक्षी मोर का है वही हाल राष्ट्रीय नदी गंगा माता का होने वाला है।

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Thursday, September 24, 2009

आइए, हम सब जुड़ें प्रकृति के लिए

हमारे पास जो कुछ भी है, वह सब प्रकृति की ही देन है. यहां तक कि ख़ुद हम भी. इसके बावजूद हम सबसे ज़्यादा दुश्मनी जिससे निभा रहे हैं, वह भी प्रकृति ही है. आज का मनुष्य जिसे सभ्यता कहता है, अगर उसके विकास के इतिहास पर नज़र डालें तो वह कुल मिलाकर प्रकृति के सत्यानाश का इतिहास दिखता है. कभी संसाधनों के दोहन के रूप में तो कभी उस पर अपनी ओर से चीज़ें थोपने के रूप में. प्रकृति पर हम तरह-तरह से अत्याचार करते आ रहे हैं और प्रकृति है कि वह हर हाल में हमें सहती आ रही है. वह हमसे जब बेतरह तंग आ जाती है, तब सिर्फ़ कराहती भर है. ये अलग बात है कि उसका कराहना ही हमारे लिए बहुत होता है. हमारी जान पर बन आती है. एक ही बार में लाखों लोग असमय काल के गाल में समा जाते हैं. कहीं सूखा तो कहीं बाढ़, कहीं तूफ़ान और कहीं ......... क्या-क्या कहें.
यह हम सब बार-बार देख रहे हैं. इसकी वजहों को समझ रहे हैं और ढंग से महसूस कर रहे हैं. अगर सिर्फ़ मंचों पर बोलने या लिखने-पढ़ने तक की बात हो तो उसमें भी हम सब बहुत आगे हैं. यह जानते हुए भी कि ऐसा करके भी हम प्रकृति और पर्यावरण का सत्यानाश ही कर रहे हैं, हम यह भी करने से बाज नहीं आ रहे हैं. सच पूछें तो आज सबसे ज़्यादा प्रदूषण वही फैला रहे हैं जो पर्यावरण के संरक्षण के नाम पर खा रहे हैं. गोष्ठियां करके वे ध्वनि प्रदूषण ही नहीं फैलाते, वहां औपचारिक चाय-नाश्ते के लिए प्लास्टिक के जो कप-प्लेट इस्तेमाल किए जाते हैं, वे कचरा बनकर क्या करते हैं यह हम सब जानते हैं. पर्यावरण विषयक कई संगोष्ठियों में मैं शिरकत कर चुका हूं. कभी ऐसा देखा नहीं कि वहां मिट्टी के कुल्हड़ों और पत्तलों का इस्तेमाल होता हो. गोरखपुर से लेकर जालन्धर और अब दिल्ली तक, कहीं भी मैंने यह नहीं देखा कि अगर गर्मी में आयोजन हो रहा हो तो उसमें कूलर का इस्तेमाल न हो रहा हो.
यहां तक कि जब ओज़ोन परत के क्षरण और उसमें क्लोरोफ्लोरो कॉर्बन की भूमिका तथा उसके स्रोत कूलर-फ्रिज की बात हो रही होती है, तो भी यह सारी बात एसी या कूलर की हवा में ही हो रही होती है. ज़ाहिर है, पर्यावरण के नाम पर काम कर रहे देश भर के ग़ैर सरकारी संगठनों में शायद ही दो-चार ऐसे संगठन हों जो सचमुच पर्यावरण के प्रति गंभीर हों. वरना ज़्यादातर संगठनों की गंभीरता केवल विभिन्न जगहों से मिलने वाली ग्रांट तक ही सीमित है. यहां तक कि ख़ुद सरकार के लिए भी पर्यावरण कोई चिंता का विषय नहीं है. यह उसके लिए भी सिर्फ़ आमदनी का एक ज़रिया भर है. कुछ मामलों में टैक्स के रूप में तो कुछ मामलों में भ्रष्टाचार की जो पुण्यसलिला गंगा बह रही है, उस रूप में.
पेड़ों को वे काट कर तस्करों-चोरों के हाथ बेच रहे हैं जिन्हें पेड़ों की रखवाली के लिए ही वेतन मिलता है. यह सब उस देश में हो रहा है जहां प्रकृति से कभी न तो लड़ने का भाव रहा है और न होड़ लेने का ही. प्रकृति हमेशा से हमारी आराध्या रही है और हममें प्रकृति के प्रति हमेशा कृतज्ञता और मित्रता का भाव ही रहा है. आज भी चाहे रूढ़ियों के रूप में सही, हम जाने कितने पेड़ों, नदियों, पहाड़ों... यहां तक कि घास को भी पूजते हैं. यह वही देश है, जहां शमी जैसे कांटेदार पौधे को बचाने के लिए 18वीं शताब्दी में ही बिश्नोई समुदाय के लोग जान देने पर तुल गए थे. बाद में उसकी ही तर्ज पर उत्तराखंड में भी चिपको आन्दोलन चला. क्या यह सब आपको कष्ट नहीं देता?
अगर हां, तो आज ही संकल्प करें, कम से कम ख़ुद अय्याशी के लिए ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे प्रकृति को नुकसान पहुंचे. फ़ालतू पानी बहाना, मामूली दूरी के लिए मोटर वाहनों का उपयोग, प्लास्टिक की थैलियों या प्रकृति को क्षति पहुंचाने वाले अन्य कार्य.... इन पर हमें ख़ुद रोक लगाना होगा. इस मामले में सरकारों से क़ानून बनाने और उस क़ानून पर अमल का इंतज़ार न करें. क्योंकि यहां क़ानून हाथी के दिखाने वाले दांतों जैसी चीज़ है. ऐसे किसी भी देश में जहां सरकार चलाने वालों में देश के संसाधनों और जनता के हितों के संरक्षण तथा जवाबदेही की भावना नहीं होती, वहां क़ानून की हैसियत जर्जर मकान जैसी ही होती है. रहे तो कोई फ़ायदा नहीं और ढहे तो नीचे रहने वालों की ही जान पर बन आए. यह उम्मीद यहां करना ही बेकार है कि सरकार इस दिशा में कुछ करने जा रही है. अब जो होगा, वह ख़ुद हमारे-आपके करने से ही होगा. किसी और की उम्मीद न करें. पहले तो ख़ुद जगें और फिर अपने निकट के हर शख़्स को जगाएं. उठें और जुट जाएं. याद रखें, काली या सफ़ेद, सारी कमाई सिर्फ़ तभी तक है, जब तक प्रकृति है. क्योंकि हमारा-आपका होना कोई निरपेक्ष क्रिया नहीं है. यह भी निर्भर है प्रकृति के होने पर. जब यह नष्ट होगी तो सबको नष्ट करेगी. उसे भी जिसने प्रकृति के नाम पर हमारी-आपकी गाढ़ी कमाई का पैसा दूहा है और उसे भी जिसे बेवजह दूहा गया है. लिहाजा प्रकृति को बचाने के लिए आपकी अपनी संवेदनशीलता और सक्रियता अनिवार्य है. इसी संवेदनशीलता और सक्रियता के लिए लोकार्पित है यह चिट्ठा. आएं, यहां अपने सुझाव, योजनाएं, लेख, कविताएं, कहानियां, प्रयास......... वह सब जो प्रकृति को समर्पित हो, चाहे वह किसी भी विधा में हो, दर्ज करें. आपका स्वागत है.

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Tuesday, September 22, 2009

प्रदूषण : कैसे-कैसे ?

ध्वनि, वायु व जल प्रदूषण
प्रदूषण कैसे कैसे,
सब जीवों के दुश्मन हैं ये
आतंकवादियों जैसे ।
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धूम-धड़का, शोर-शराबा
बेहद हानिकारक,
कानों को ये बधिर बना दें
इनकी शक्ति मारक ।
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इसीलिए सीमित कर ध्वनि को
प्रदूषण रुके बिन पैसे । ।
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पेट्रोल, डीज़ल के धुंए से
प्रदूषित होती वायु,
हवा में घुलता ज़हर इसी से
जीवों की घटती आयु ।
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वृक्ष लगाओ, ये वायु के
शुद्धिकारक जैसे । ।
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गंदे - दूषित जल से नदियों का
पानी निर्मल नहीं,
जल-संरक्षण व जल-उपचार
ये उपाय हैं सही ।
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जल ही जीवन है ये मानो
जल को जल के जैसे । ।
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भू को दूषित कर रहे
कचरा - पोलिथीन,
जिससे होती भूमि की
उर्वरा शक्ति क्षीण ।
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भू-प्रदूषण रोको वरना
अन्न उगेगा कैसे ? ?
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राकेश 'सोहम'

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