इयत्ता-प्रकृति

Friday, November 27, 2009

प्लास्टिक बैग : इमानदार कोशिश की ज़रूरत




दो सप्ताह पूर्व पत्नी जी की तबियत अचानक ज्यादा ख़राब हो हुई और रातोंरात नागपुर इलाज़ हेतु जाना पड़ा । वहाँ जितनी बार दवाओं की ज़रूरत पड़ी हर बार अलग-अलग जगह से खरीदारी करनी पड़ी । इस खरीदारी से एक बात उभर कर सामने आई कि मेडिकल-स्टोर्स वालों ने दवाइयां कागज़ के पैकिट में रखकर दीं ।

पिछले सप्ताह जबलपुर वापस आ गया । यहाँ पर जब मेडिकल स्टोर्स से दवा खरीदी तो पोलिथीन या प्लास्टिक के बैग रखकर दीं गयीं । आज जबलपुर शहर में ऐसे बैग का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है । फ़िर चाहे आप दवाइयां खरीदें, सब्जियां खरीदें या और कुछ ।
अभी कल ऑफिस से लौटा । पत्नी जी ने स्वागत के साथ गुस्सा इस बात का दिखाया कि मैं लौटते समय सब्जी खरीदते हुए क्यों नहीं आया ? खैर मैंने कपड़े का थैला उठाते हुए कहा, 'अब जाता हूँ वरना सब्जी पोलिथीन बैग में लानी पड़ती ।' मैं पैदल रोड के किनारे सब्जी ठेलों के पास पहुँचा । रास्ते में अनेक सांध्यकालीन घूमने वाले लोग अपने दोनों हाथों कि तमाम अँगुलियों में सब्जी भरे पोलीथिन बैग टाँगे थे । लोगों की ऐसी मानसिकता पर तरस आता है। घूमने रोज़ जाते हैं लेकिन एक कपड़े की थैली साथ ले जाना गवारा नहीं !
एक ख़बर है नेशनल ज्योग्राफिक की पहल पर एक अभियान शुरू किया जा रहा है कि प्लास्टिक की थैलियों की कपड़े की थैलियों का इस्तेमाल हो, जिनका पुनः प्रयोग किया जा सकता है। अगर हम पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हैं तो क्या इस अभियान को सफलता मिलेगी ? असली सवाल यह है कि क्या हम पर्यावरण के लिए अपनी जीवन-शैली बदलेंगे ?

कुछ आठ माह पूर्व जबलपुर शहर में कचरे के ढेर पर चरने वाली तीन गायें मर गयीं । उनका पेट बुरी तरह फूल गया था । लोगों की पहल पर पथु-चिकित्सकों द्वारा इन गायों का पोस्मार्टम किया गया । उनके पेट से कई किलो प्लास्टिक और पोलिथीन की थैलियाँ निकलीं, जिससे उनकी खाने की आंत अवरुद्ध हो गयीं थीं । पेट से निकली इन थैलियों में से कई में तो सब्जियों के छिलके और खाने की चीज़ें भरी हुई थीं !! लोग इन थैलियों का उपयोग सब्जी आदि खरीदनें में करते हैं और बाद में इनमे सब्जियों के छिलके या खाने की वस्तुएं भरकर, गठान लगाकर फेक देते हैं ! जिन्हें पशु उदरस्थ कर लेते हैं । शहर की नालियां इन पन्नियों से जाम हो गयीं हैं ।

नॅशनल ज्योग्राफिक ग्लोबल स्कैन - ग्रीन डेस्क २००८ द्वारा विश्व भर में किए गए सर्वे के आधार पर कहा कि भारत में जीवन शैली अन्य उन्नत राष्ट्रों के मुकाबले ज्यादा दीर्घकालिक और स्थायी है । तो क्या ऐसी मानसिकता के चलते हम पर्यावरण को धोका नहीं दे रहे हैं ?

हमें चेतना होगा, एक इमानदार कोशिश करना होगी । एक कठोर कानून की आवश्यकता है, जिसमें प्लास्टिक की थैलियों के उत्पादन, उनके संग्रह और वितरण पर प्रतिबन्ध हो ।

आप सोच रहे होंगे पत्नि, प्लास्टिक, पोलिथीन पुराण ये सब क्या है ? और सुनिए - सब्जी से भरा कपड़े का थैला लेकर घर लौटा तो पत्नि जी ने कहा, 'एकाध सब्जी और ले आते, बार-बार न जाना पड़ता । ' मैनें कहा, 'थैले में जगह नहीं थी ।' 'तो क्या पन्नियाँ नहीं थी ?' पत्नि जी ने कहा ।

'थीं तो, लेकिन अदरक, धनिया की पत्ती और हरी मिर्च अपने रूमाल में बाँध लाया हूँ', मैंने दूसरे हाथ में पकड़ी रूमाल की पोटली उन्हें थमा दी । वे मुस्कुरा उठीं मानों कह रही हों - 'तुम्हारी इमानदारी को ओढें या बिछाएं ?'

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Tuesday, November 17, 2009

गुबरैले


Dung Beetle हमारे पैर गंगा की रेती में अचानक रुक गये। सामने दो गुबरैले जो एक ढेले को खींचते धकेलते जा रहे थे; हमारे पैरों की धमक से अचानक सुकुत्त हो गये थे। मेरी पत्नीजी ने मुझे आगाह किया था, अन्यथा उनपर पैर पड़ जाता। उन्हें हमारी उपस्थिति का आभास था। अत: वे चुपचाप पड़े थे। हम लोग धीरे से एक कदम पीछे हट गये। लगभग आधे मिनट बाद वे पुन: ढेला धकेलने लगे।

मुझे मालुम है कि यह बहुत बड़ा ईवेण्ट नहीं है। पर आदमी की पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के बावजूद अभी गुबरैले हैं। प्रकृति के कर्मठ सफाई कर्मी। और वे न मेहनताना मांगते हैं, न ड्यूटी से नगरपालिका के कामचोर कर्मचारियों की तरह गायब रहते हैं।

गुबरैलों के बारे में श्री पंकज अवधिया की बहुत बढ़िया अतिथि पोस्ट है मानसिक हलचल पर: गुबरैला एक समर्पित सफाई कर्मी है। आप उसे देखने की कृपा करें। यह है उस पोस्ट का अंश:

ये प्रकृति के सफाई कर्मचारी हैं। इनके बारे मे कहा जाता है कि यदि ये न होते तो अफ्रीका के जंगल अब तक जानवरों मे मल की कई परतों मे दब चुके होते। हमने अपने शहर से इन सफाई कर्मचारियों को भगा दिया है। हम इन्हे देखते ही चप्पल उठा लेते हैं और मारने मे देर नही करते हैं। ये गुबरैले ( डंग बीटल ) मल को गेंद की शक्ल देकर लुढ़काते हुये ले जाते हैं और अपनी प्रेमिका को दिखाते हैं। बडी गेंद लाने वाले प्रेमी को पसन्द किया जाता है। मादायें गेंद रुपी उपहार लेकर मिट्टी में दबा देती हैं, फिर उसी मे अंडे देती हैं ताकि बच्चो के बाहर निकलने पर भोजन की कमी न रहे। विश्व के बहुत से देशों मे मानव की गन्दगी से निपटने अब इन मुफ्त के सफाई कर्मचारियो को वापस बुलाया जा रहा है। भारत में भी इनकी जरुरत है।

गंगा के कछार में गायें-भैसें करती हैं गोबर। उसमें अनेक प्रकार के कीड़े दीखते हैं जो उसको डी-कम्पोज करते हैं। ये गुबरैले भी उस शॄंखला में हैं और मुस्तैद हैं। यह अनुभव कर अच्छा लगा।

गंगा मानव के हिंसक अनाचार को सह कर भी जियें और हमारी जीवनदयिनी बनी रहें – यह  सदैव मन में आता रहता है। गुबरैले को देख कर वह विचार कुछ बल पाया।

क्या आप मुंह बिचका रहे हैं गुबरैले पर पोस्ट देख कर?! अब आप अपने समय बरबादी के रिस्क पर ही तो पढ़ते हैं पर्यावरण विषय पर!

यह वीडियो है उन्ही गुबरैलों का:


Monday, November 16, 2009

अखबार वाले छापें तो!

Ganga Safai कल मैं व्यग्र था कि कल के रविवासरीय गंगा घाट सफाई कार्यक्रम की रपट कोई स्थानीय अखबार वाला छाप तो दे! दो सज्जनों को सम्पर्क किया। प्रेसविज्ञप्तियात्मक राआइट-अप बना ई-मेल किया। और अब भी अपना अनुमान लगा रहा हूं कि किसने छापा होगा!
छपास मुझमें कभी न थी। अपने लिये है भी नहीं। पर जो लोग स्वयँ-स्फूर्त सेवा का काम कर रहे हैं - और बीस-पच्चीस लोग हैं; उनका प्रिण्ट मीडिया में वर्णन उनके लिये रीवाइटलाइजर है।
अब लग रहा है कि कोई अखबार मुझे गंगाविषयक साप्ताहिक कॉलम लिखने का स्पेस दे दे तो कितना भला हो! क्या स्क्राइब बनने का यह रूट है!
आप वह राइट-अप देखें जो मैने पत्रकार मित्रों को ई-मेल किया -   

शिवकुटी में गंगाघाट की सफाई
Ganga safai1 इलाहाबाद के उत्तरीपूर्वी छोर पर शिवकुटी घाट की सफाई के लिये कुछ लोग इकठ्ठा हो कर पिछले तीन सप्ताह से प्रयास कर रहे हैं। इस समूह में लगभग २०-२५ लोग रविवार को सुबह डेढ़ घण्टे घाट की सफाई, मरम्मत और सीढियों के रखरखाव का काम करते हैं। ये लोग अपनी गतिविधियां और व्यापक करने की सोच रहे हैं।
अब तक इन लोगों ने लगभग डेढ़-दो टन घाट का कचरा इकठ्ठा कर डिस्पोज किया है। उसमें पॉलीथीन की पन्नियां और खण्डित मूर्तियां प्रमुख हैं। यह कचरा लगभग २५० मीटर लम्बे और १०० मीटर के आधार के त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैला होता है। यह समूह उस कचरे को इकठ्ठा कर एक लैण्ड-फिल में समेटता है कचरा न उड़े, इसके लिये उसपर रेत की एक परत डाली जाती है।
इस रविवार को गंगा की कटान से घाट को क्षरण से रोकने के लिये तीस बोरियों में रेत भर कर जमाया गया। इससे नित्य स्नानार्थियों को सहूलियत होगी।shivakuti panda
इस स्वत स्फूर्त समूह में दुकानदार, सरकारी कर्मी, बच्चे और महिलायें और इस घाट के पण्डा शामिल हैं।
समूह में जो नियमित लोग हैं उनमें सर्वश्री आद्याप्रसाद पाण्डेय, दिनेश पाण्डेय, पंकज सिंह, कमलेश तिवारी, भरतलाल, मनोज शुक्ल, ऋषि शर्मा, ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, चन्द्रमा और लवकुश कनौजिया, नरेन्द्र मिश्र, हिमांशु, प्रांजल, अभ्युदय और महीप शामिल हैं।
अगले रविवार यह समूह पुन: मिलेगा, अपनी गतिविधियां जारी रखने को।
मेरी गंगा विषयक पोस्टें आप यहां देखें।

अपडेट - मेरी पत्नीजी ने बताया कि जागरण समूह के आई-नेक्स्ट ने इस विषय को कवर कर लिया है। मेरे बन्धुओं को कुछ रीवाइटल मिला होगा जरूर! कल बतायेंगे वे लोग! :-)

Monday, November 9, 2009

नदी बोलती है!


gangamai व्यक्तिगत रूप से मैं प्रचारतन्त्र से दूर रहता हूं, पर गंगा सफाई के मामले में मुझे लगा कि अखबार की जरूरत है। साथ में जुड़े लोगों का राग प्रिण्ट में अपना नाम देखने का बहुत है, और वह उन्हें प्रेरित कर सकता है नियमित गंगा-स्वयंसेवक बनने में।

मुझे आग्रह करना पड़ा अखबार वाले सज्जन को। उनसे अनुरोध भी किया कि वे ब्लॉग से मसाला उठालें। पर लगता है वे कम्प्यूटर सैवी न थे।

और उन्होंने मुझसे पूछ लिया – यह सफाई का विचार कैसे आया आपको?

यह एक स्टेण्डर्ड इण्टरव्यू प्रश्न है। और जिससे पूछा गया है, वह विवरण देने में जुट जायेगा। पर मुझे बड़ा अटपटा लगा।

baalooगंगाजी की बालू में बिल बना कर घुसा कोई कीड़ा
असल में आप अगर नदी के किनारे नियमित जाते हैं, और उसे अपनी मां का दर्जा देते हैं; तो नदी आपको सहज भाव से लेती है। आप छोटी छोटी बातें देखते हैं। वह बोलती नहीं। आपको फोटो खींचने देती है। आपको ब्लॉग पोस्टें बनाने देती है। पर आप उसी में मगन हो कर चुक नहीं जाते, या उसी में नहीं समझ लेते अपने कृतित्व की पूर्णता, तो वह धीरे धीरे महीन स्वरों में बोलने लगती है। अगर आप नियमित सुनना चाहते हैं तो वह अपना हृदय खोल देती है।

यही करती हैं गंगा माई। कभी कभी शाम के अंधकार में, जब और कोई नहीं होता तो बहुत स्पष्ट स्वरों में कहती हैं। चमत्कृत कर देती हैं। ट्रांस में ला देती हैं।

मुझे लगा कि वे पत्रकार महोदय नहीं समझेंगे यह बात। और नहीं समझे भी। पर इष्टदेव सांकृत्यायन जी का यह इयत्ता-प्रकृति शायद समझे। देखा जाये!

जय गंगा माई!